बड़ों का साया
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बड़ों का साया

राजेश की चीखती आवाज रात के सन्नाटे में घर की दीवारों को भेदकर बाहर अड़ोस-पड़ोस में भी पहुंच रही थी।उसका अनवरत बोलना चालू था। तुमने मेरे घर का सत्यानाश कर दिया।तुम्हें घर चलाना आता ही नहीं। तुम इस लायक नहीं कि ऐसे घर में रह सको। अभी के अभी इन नालायकों के साथ घर से निकाल जाओ। मैं अब इस घर में तुम्हें एक मिनिट भी नहीं देख सकता।

रजनी अवाक सी खड़ी उसकी बातें सुन रही थी। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि ये राजेश बोल रहा है। जिसने उससे प्रेम विवाह किया था। साथ जीने मरने की कसमें खाईं थीं। परिवार को शादी के लिए मनाने में तीन साल का इंतजार किया था।आज इतनी नफ़रत। एक एक शब्द नस्तर की भांति उसके दिल में चुभ रहे थे। उसे अपना अस्तित्व आधार हीन लगने लगा। उसके दोनों किशोर वय बेटे सहमे से पापा की बातें सुन रो रहे थे।

रजनी ने राजेश की बातों का कोई प्रतिकार नहीं किया।वह दोनों बच्चों को लेकर अपने कमरे में चली गई और दरवाजा बंद कर लिया। दरवाजा बंद करते ही उसे ऐसा लगा जैसे वह किसी सुरक्षित घेरे में समा गई हो। बच्चों को अपने से चिपका उन्हें चुप कराया और उन्हें समझाने लगी डरने की जरूरत नहीं है।

बच्चे बोले मम्मी पापा हमें घर से निकाल देंगे।हम कहां जाएंगे।

ऐसा कुछ नहीं होगा। तुम बैठो,अभी मैं तुम्हें खाना खिलाती हूं।

करीब एक घंटे बाद घर में शांति छा गई। राजेश नशे में धुत था सो गया। रजनी ने बच्चों को खाना खिलाया। बच्चों ने जिद कर मम्मी को भी अपने साथ खिलाया हांलाकि उसका पेट तो राजेश की बातों से ही भर गया था, किन्तु बच्चों का मन रखने के लिए थोड़ा खा लिया। बच्चों को सुला वह भी लेट गई। आंखों से नींद कोसों दूर थी।वह अपने अतीत में खो गई।

राजेश और उसकी भेंट कॉलेज में हुई थी। वे पहले दोस्त बने, फिर कुछ समय बाद दोनों ने अनुभव किया कि वे दोस्त से कुछ ज्यादा एक दूसरे के लिए भावनायें रखते हैं। और फिर धीरे-धीरे वे एक दूसरे के प्यार में खो गए। पढ़ाई पूरी होने के बाद उनकी जॉब बैंक में लग गई।अब उन्होंने अपने घर वालों को अपनी चाहत के बारे में बताया। दोनों ही परिवार जाति अलग होने से तैयार नहीं थे।तीन साल का लम्बा इंतजार करने के बाद वे माता-पिता को मनाने सफल हो गए और शादी हो गई। हंसी खुशी पन्द्रह साल बीत गए। दो बेटों से उनके घर में रौनक थी। कहीं कोई कमी नहीं थी फिर अब अचानक ये सब क्या है। राजेश को हो क्या गया है। कुछ परेशानी है तो मुझे बताता क्यों नहीं। मैं शायद उसकी कुछ मदद कर सकूं। पर यह रोज रोज पीकर आना बच्चों के सामने इस तरह तमाशा करना। छः महीने हो गए घर का वातावरण बोझिल हो चुका है। बच्चों की पढ़ाई पर, उनके मन पर भी असर पड़ रहा है।जो बेटे राजेश की आंखों के तारे थे अब उन पर भी चिल्लाना, कभी हाथ भी उठा देता।समझ नहीं आ रहा क्या करूं। और आज तो हद हो गई घर से निकलने की धमकी। मेरे स्वर्ग से घर को किसकी नजर लग गई।कल सुबह फिर समझाने की कोशिश करुंगी।समझता है तो सही नहीं तो फिर बच्चों के भविष्य के लिए कोई अन्य ठोस कदम उठाना पड़ेगा। निश्चय पर पंहुच कुछ उसे मानसिक शांति मिली और कब वह नींद के आगोश में चली गई उसे स्वयं भी पता नहीं चल।

सुबह उसने राजेश को चाय दी। फिर बच्चों को तैयार कर टिफिन दे बस पर स्कूल के लिए छोड़ कर आई और ऑफिस जाने के लिए ख़ाना बनाने लगी,मन में विचार उमड़-घुमड़ रहे थे कि कैसे राजेश से बात करे। यदि वह फिर उखड़ गया तो।

तभी राजेश किचन में आया रजनी मुझे रात के व्यवहार के लिए माफ कर दो। नशे में पता नहीं तुम्हें क्या क्या बोल गया।अब आगे से ऐसा नहीं होगा। रजनी उसके कंधे पर सिर रख रोने लगी।वह भी रजनी को रोता देख दुखी हो गया।अब कभी ऐसा नहीं बोलूंगा।

राजेश तुम्हारे इस तरह के व्यवहार से मैं तो दुखी हो ही रही हूं बच्चों के मन पर, उनकी पढ़ाई पर भी असर पड़ रहा है। कुछ तो सोचो बच्चों का जीवन बर्बाद हो जाएगा। आखिर तुम्हें क्या परेशानी है जो तुम इतना पीने लगे हो,मुझे तो बता सकते हो,शायद मैं तुम्हारी कुछ मदद कर सकूं।

नहीं ऐसा कुछ नहीं है,थोड़े दिनों से कुछ नये दोस्त बने हैं बस उन्हीं के साथ बैठता हूं तो थोड़ा ज्यादा पी लेता हूं।

राजेश उनकी दोस्ती छोड़ दो वे तुम्हें कहीं का नहीं रखेंगे। तुम्हारी जिन्दगी बर्बाद कर देंगे।

चाहता तो मैं भी यही हूं किन्तु ऑफिस के बाद वे मानते ही नहीं हैं साथ ले जाते हैं थोड़ी देर बाद घर चले जाना थोड़ा इंज्वॉय करते हैं।

तुम अपने स्वास्थ्य और परिवार के बारे में सोचो। राजेश तुम क्या थे और क्या होते जा रहे हो।

सॉरी अब नहीं बैठूंगा। चलें ऑफिस।

ऐसा ही हर बार होता। दो-चार दिन समय पर आता फिर वही पीना,लेट आना, माहौल खराब करना।

आज तो हद ही हो गई बोला कितनी बेशर्म औरत है बार-बार कहने के बाद भी मेरा घर छोड़कर नहीं जा रही। अरे जा जिससे मैं सुखपूर्वक आजादी से रह सकूं।

रजनी बोली घर मेरा भी है क्यों जाऊं।

क्या कहा तेरा घर है। क्या तेरे बाप ने दिया है। मैंने बनाया है इसे। मुझसे जबान लड़ाती है कहते हुए उसने एक चांटा उसके गाल पर मार दिया।

आज रजनी की सहनशक्ति जवाब दे गई। उसने घर छोड़ने का निर्णय ले लिया। दूसरे दिन ऑफिस में उसने अपनी सहेली से चर्चा की और बताया उसे किराए का मकान दिलवाने में मदद करें।

वह बोली परेशान मत हो मेरे घर में ही दो कमरे किचन का पोर्शन अभी पिछले महीने ही खाली हुआ है, यदि तुझे पसंद

आए तो देख ले नहीं तो फिर दूसरा देखेंगे।

रजनी ने सोचा यही मकान ठीक रहेगा जाने पहचाने लोग हैं। कभी देर सबेर होने पर बच्चे भी अकेले नहीं रहेंगे। पहली बार अकेली रहूंगी पता नहीं कौन कैसे लोग मिलें। उसने वही मकान ले लिया। दो-चार दिन में पूरा सामान इकट्ठा कर रहने लायक व्यवस्था कर ली और शाम को ही बच्चों को लेकर शिफ्ट कर लिया और चाबी पड़ोस में दे गई ।

रात को राजेश आया तो पड़ोसी ने चाबी दी तो वह बोला रजनी कहां गई।

पता नहीं बताया नहीं हमें तो केवल आपको देने को चाबी दी थी।

चाबी ले जब वह घर में घुसा तो घर में पसरा सन्नाटा उसे चीर गया। घर वीरान सा लगा। किस पर गुस्सा उतारे । किस पर चीखे। किचन में देखा खाना रखा था खाने को मन नहीं हुआ। नशे में था सो, सो गया। सुबह उठकर घर की खामोशी उसे चिढ़ाने लगी।समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। आखिर रजनी बिना बताए बच्चों को लेकर कहां चली गई। उसने अपने घर फोन लगाया, रजनी के घर फोन लगाया कहीं नहीं थी। उसकी सहेलियों से भी पूछा।अब वह हैरान था कि कहां ढूंढे। वह रजनी के बैंक गया वहां वह काम कर रही थी। उसने वहां उससे बात करने की कोशिश की रजनी ने मना कर दिया अभी यहां बात करने का समय नहीं है। फिर जब वह नहीं माना तो रजनी छुट्टी लेकर उसके साथ एक पार्क में जाकर बैठ गई और बोली अब तुम क्या चाहते हो। रोज -रोज की धमकी से मैं तंग हो चुकी थी सो छोड़ दिया तुम्हारा घर। मैंने अपने जीवन के पन्द्रह साल उस घर को सजाने संवारने में लगाए और तुमने एक मिनिट में कह दिया घर मेरा है निकल जाओ। निकल गई अब क्या चाहते हो।

लौट चलो, अब नहीं कहूंगा।

नहीं अब यह संभव नहीं है। मेरे बच्चों पर भी असर पड़ रहा है। मैं उनका भविष्य खराब नहीं कर सकती तुम लौट जाओ मैं अब तुम्हारे साथ नहीं रह सकती। तुम्हारा घर तुम्हें मुबारक हो। और हां यदि कभी तुमने मुझसे जरा सा भी सच्चे दिल से प्यार किया हो तो उस प्यार की कसम अब कभी हमसे मिलने की कोशिश मत करना।हम भी ख़ुश हैं तुम भी अपने घर में खुश रहो। अपनी मन मर्जी से आराम से जियो।

राजेश अपना-सा मुंह लेकर लौट आया । घर की व्यवस्था करना उसके वश की बात नहीं थी। घर की खामोश दीवारें उसे डरावनी लगतीं। घर का सन्नाटा श्मशान सा प्रतीत होता।वह इस सन्नाटे से परेशान हो गया। उसे रातों को नींद नहीं आती। रजनी और बेटों की याद आती।जो घर बच्चों की नोंक झोंक से, रजनी की उपस्थिति से गुंजायमान होता रहता था, जो दीवारें सजी-संवरी बोलती सी प्रतीत होतीं थीं वे ही अब डरावनी प्रतीत होतीं।मौत का सा सन्नाटा हमेशा पसरा रहता।पूरा घर अस्त-व्यस्त रहता।अब उसे अपनी गल्ती का अहसास रह-रहकर हो रहा था कि उसने रजनी से क्या कुछ नहीं कहा। यहां तक उस पर, बच्चों पर हाथ तक उठाया। क्या ग़लती थी उनकी । जिस घर पर मुझे इतना गुमान था वह घर, घर नहीं रहा। दीवारें खड़ी हैं। घर दीवारों से नहीं परिवार से बनता है। आज उसे परिवार की अहमियत समझ आ गई।

आज चार साल हो गए वह पागलों की तरह घर में अकेले सिर फोड़ता है।कई बार फोन कर रजनी को मनाने की कोशिश की किन्तु वह टस से मस नहीं हुई । बच्चों से मिलने स्कूल जाता,वह भी ढंग से बात नहीं करते डरे सहमे से रहते।आज उसे याद आ रहा था कि घर पाकर किन्तु परिवार को दूर कर असल में उसने अपने जीवन का सुख चैन खो दिया था।बस अब उसे प्रतीक्षा थी कि कब रजनी उसे माफ कर बच्चों के साथ घर लौट आए तो उसके घर की दीवारें फिर से बोलने लगें।

तभी राजेश बीमार पड़ गया और उसके दोस्तों ने उसे ऐडमिट करा दिया।दो दिन तक ठीक न होने पर उन्होंने रजनी एवं उसके माता-पिता को सूचित कर दिया। वे भागे-भागे दूसरे दिन हास्पिटल पहुंचें और उसी दिन रजनी भी बच्चों को लेकर पहुंची। वहां सास-ससुर को देख कर अचम्भित हो गई।वह उनसे प्रेम पूर्वक मिली, बच्चे भी दादा-दादी को देख कर खुश हो गए। वहां रजनी को देख सास-ससुर की आंखों में उम्मीद की किरण जगी। उन्होंने शीघ्र ही उसके माता-पिता को भी बुला लिया।

बच्चों व रजनी को देख राजेश खुशी से चहक उठा। उसकी आधी बीमारी तो जैसे उन्हें देखते ही दूर हो गई।

फिर सबके समझाने पर, बच्चों के सिर पर पिता का साया होने का वास्ता दिया। रजनी स्वयं दिलसे अभी भी राजेश से दूर नहीं हुई थी। किन्तु उसने, उसे आहत ही इतना किया था कि अलग होने के सिवा कोई चारा नहीं बचा था।

सब बड़ों की इच्छा का मान रखते हुए, बच्चों के भविष्य को देखते हुए ‌वह इस वादे के साथ कि राजेश अब फिर कभी इस तरह का व्यवहार नहीं करेगा साथ रहने को राजी हो गई।

हास्पिटल से छुट्टी होते ही सब घर आए।आज हंसी के ठहाकों से एवं परिवार जनों की उपस्थिति से घर गुलजार हो उठा। बर्षों की जमी उदासी की परत दीवारों से छिटक उसका स्थान आंनद की आभा ले चुकी थी। शान्त दीवारें फिर बोल उठीं थीं।

सच ही है बड़ों के साये ने एक उजड़ता घरोंदा फिर से आबाद कर दिया था।

शिव कुमारी शुक्ला

27-7-25

स्व रचित एवं अप्रकाशित

बिषय*****घर दीवार से नहीं परिवार से बनता है



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